Gen Z टिप्पणी: CJP नेताओं की हिरासत मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई, याचिका वापस

sonam kumari
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Gen Z टिप्पणी: CJP नेताओं की हिरासत मामले में हाईकोर्ट में सुनवाई, याचिका वापस

Gen Z टिप्पणी: सौरव दास और आशुतोष रांका की उम्र पूछने के बाद अदालत ने जेनरेशन जेड को लेकर हल्की-फुल्की टिप्पणी की। सुनवाई के दौरान हिरासत बढ़ाने के आदेश और वैकल्पिक कानूनी उपायों पर भी चर्चा हुई।

दिल्ली हाईकोर्ट में बुधवार को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका की याचिका पर सुनवाई के दौरान जेनरेशन जेड (Gen Z) को लेकर दिलचस्प बातचीत हुई। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने दोनों नेताओं की उम्र जानने के बाद टिप्पणी की कि वे Gen Z की श्रेणी में नहीं आते। हालांकि, सुनवाई का मुख्य विषय उनकी न्यायिक हिरासत बढ़ाने के आदेश को चुनौती देना था।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता अभिक चिमनी से अदालत ने दोनों नेताओं की उम्र पूछी। वकील ने बताया कि सौरव दास 27 वर्ष और आशुतोष रांका 32 वर्ष के हैं।

इस पर न्यायमूर्ति प्रसाद ने पूछा, “तो आप Gen Z नहीं हैं। Gen Z क्या है?” अदालत को बताया गया कि आम तौर पर 1997 के बाद जन्मे लोगों को Gen Z कहा जाता है। इसके बाद न्यायमूर्ति ने दोहराया कि दोनों नेता इस पीढ़ी में शामिल नहीं हैं।

इस टिप्पणी के बाद CJP नेता अभिजीत दीपके ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर साझा करते हुए लिखा कि केवल वही Gen Z की श्रेणी में आते हैं। इस पोस्ट के बाद अदालत में हुई बातचीत सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई।

Gen Z टिप्पणी: हिरासत बढ़ाने के आदेश को दी गई थी चुनौती

हाईकोर्ट में यह सुनवाई विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) के 19 अक्टूबर के आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर हुई। इस आदेश में दोनों नेताओं की न्यायिक हिरासत 21 अक्टूबर तक बढ़ाई गई थी।

याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि मजिस्ट्रेट के पास हिरासत बढ़ाने का अधिकार नहीं था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित मामले में निवारक कार्रवाई का इस्तेमाल उचित तरीके से नहीं किया गया।

वकील ने जमानतदारों को स्वीकार नहीं किए जाने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि दो अतिरिक्त जमानतदार उपलब्ध थे, लेकिन उनके दस्तावेजों और विवरणों पर विचार नहीं किया गया। उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश में तस्वीरों से जुड़ी विसंगतियों और पहचान संबंधी जानकारी के सत्यापन में आई कठिनाइयों का भी उल्लेख किया।

ये दलीलें याचिकाकर्ताओं के पक्ष की थीं। अदालत ने इन आरोपों पर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया।

अदालत ने वैकल्पिक कानूनी उपाय अपनाने का दिया सुझाव

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति प्रसाद ने सवाल उठाया कि याचिकाकर्ताओं ने संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत सीधे हाईकोर्ट का दरवाजा क्यों खटखटाया, जबकि मजिस्ट्रेट के आदेश को चुनौती देने के लिए पुनरीक्षण याचिका का विकल्प उपलब्ध हो सकता है।

अदालत ने शांति बनाए रखने के लिए दिए गए बॉन्ड के कथित उल्लंघन का भी जिक्र किया। पीठ ने सवाल किया कि यदि शांति बॉन्ड का दोबारा उल्लंघन हुआ है, तो क्या अधिकारी अधिक सख्त जमानत शर्तें लगाने की मांग नहीं कर सकते।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मुद्दे पर भी अदालत ने टिप्पणी की। पीठ ने ध्यान दिलाया कि जंतर-मंतर को निर्धारित प्रदर्शन स्थल की सूची से हटाने संबंधी मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और संबंधित अधिसूचना पर रोक नहीं लगाई गई है।

अदालत ने बैरिकेड तोड़े जाने पर चिंता जताते हुए कहा कि ऐसी घटनाएं दूसरे लोगों को भी प्रतिबंधात्मक आदेशों का उल्लंघन करने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं। इस संदर्भ में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 का उल्लेख किया गया।

याचिकाकर्ताओं ने वापस ली याचिका

हाईकोर्ट ने सुझाव दिया कि याचिकाकर्ता पहले विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाली कार्यवाही का इंतजार करें, जहां जमानतदारों के मामले पर दोपहर दो बजे फिर विचार किया जाना था।

इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने अपनी याचिका वापस ले ली। अदालत ने इसकी अनुमति देते हुए स्पष्ट किया कि उसने मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है।

दिल्ली पुलिस की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा और अधिवक्ता आशीष दीक्षित पेश हुए, जबकि याचिकाकर्ताओं का पक्ष अधिवक्ता अभिक चिमनी ने रखा।

इस सुनवाई में Gen Z को लेकर हुई टिप्पणी ने ध्यान आकर्षित किया, लेकिन मामले का मुख्य कानूनी पहलू हिरासत के आदेश को चुनौती देने के लिए उचित प्रक्रिया और उपलब्ध वैकल्पिक उपायों से संबंधित रहा।

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