JTET Controversy: झारखंड में जेटीईटी परीक्षा और क्षेत्रीय भाषाओं को लेकर चल रहा विवाद अब राजनीतिक और सामाजिक बहस का बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है. भाषा विवाद को सुलझाने के लिए गठित मंत्रियों की पांच सदस्यीय समिति की गुरुवार को दूसरी अहम बैठक हुई, लेकिन भोजपुरी, मगही और अंगिका भाषाओं को फिर से परीक्षा प्रक्रिया में शामिल करने के मुद्दे पर कोई सहमति नहीं बन सकी.
सूत्रों के मुताबिक बैठक में सत्ता पक्ष के भीतर अलग-अलग राय सामने आई। झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) कोटे से शामिल मंत्री सुदीव सोनू और योगेन्द्र प्रसाद इन भाषाओं को दोबारा शामिल करने के पक्ष में नहीं दिखे. वहीं कांग्रेस कोटे से मंत्री राधा कृष्ण किशोर और दीपिका पांडे सिंह समेत राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के मंत्री संजय यादव ने भोजपुरी, मगही और अंगिका को फिर से शामिल कर परीक्षा आयोजित करने का समर्थन किया.
समिति के संयोजक और वित्त मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने बैठक के बाद कहा कि यह संभवत: समिति की आखिरी बैठक हो सकती है. उन्होंने कहा कि मंत्री सुदिव सोनू ने समिति में अल्पसंख्यक और आदिवासी समुदाय के मंत्रियों को भी शामिल करने की मांग की है. यदि कमेटी का विस्तार होगा, तभी अगली बैठक बुलाई जा सकेगी। मंत्री राधा कृष्ण किशोर ने कहा कि समिति जल्द ही अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को सौंपेगी, जिसके बाद सरकार अंतिम निर्णय लेगी.
दरअसल, विवाद तब शुरू हुआ जब झारखंड शिक्षक पात्रता परीक्षा (JTET) के नए नियमों से भोजपुरी, मगही और अंगिका जैसी भाषाओं को बाहर कर दिया गया. इसके बाद राज्य के कई जिलों में छात्रों और भाषा संगठनों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. बढ़ते विवाद को देखते हुए सरकार ने समाधान निकालने के लिए उच्च स्तरीय मंत्रियों की एक कमेटी बनाई थी.
यह मामला अब सिर्फ अकादमिक मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक समीकरणों से भी जुड़ गया है. पलामू, गढ़वा और संताल परगना समेत कई इलाकों में भाषा आधारित समूह उनके पक्ष में गोलबंद हो गये हैं. एक पक्ष का कहना है कि भोजपुरी, मगही और अंगिका लाखों लोगों की मातृभाषाएं हैं, इसलिए इन्हें परीक्षा से बाहर रखना अन्याय है. दूसरा पक्ष तर्क दे रहा है कि झारखंड की मूल आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
इस विवाद के बीच पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने भी साफ कहा है कि मगही, भोजपुरी और मैथिली जैसी भाषाओं को शामिल नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भाषा विवाद को टकराव से नहीं बल्कि आपसी सौहार्द और जमीनी हकीकत को ध्यान में रखते हुए सुलझाया जाना चाहिए. झारखंड में जेटीईटी भाषा विवाद आने वाले दिनों में और राजनीतिक रूप ले सकता है. अब सभी की निगाहें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सरकार के अंतिम फैसले पर टिकी हैं.
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